तारीख ०२ जुलाई.....सुबह सुबह टीवी ऑन किया....ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी...समलैंगिकता अब अपराध नहीं...दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकों को दे दी मान्यता...मन तो किया टीवी फोड़ दूं.....ऑफिस गया तो वहां का भी माहौल इस खबर से खासा प्रभावित था। हर बंदा दूसरे को बधाई दिए जा रहा था, मेरा मतलब हर लड़का दूसरे लड़के को, और हर लड़की दूसरी को.....! दूसरे दफ्तरों का भी यही हाल था।...कोई कह रहा था...''अबे अमित, खुश तो बहुत होगा तू आज'', किसी के अल्फाज थे- ''ओए गौरव, अब तो कोर्ट की भी परमिशन मिल गई..." टीवी पर बहस-मुबाहिसों का दौर जारी था। हर चैनल पर तीन-चार बुद्धि के भसुर लोग बैठ के बौद्धिक जुगाली किए जा रहे थे। मैंने जान-बूझकर उस दिन इस मुद्दे पर कोई प्रोग्राम नहीं बनाने का फैसला लिया।....और लालगढ़ से आई एक एक्सक्लूसिव स्टोरी पर लग गया। लेकिन मन में लगातार ये सवाल कोच रहा था, मैं इस फैसले से खुश हूं या नाखुश ?....महसूस तो यही हो रहा है कि मुझे लगता है इसे अपराध के दर्जे से नहीं निकालना चाहिए था.....क्योंकि अब तक तो केवल लड़कियों के बलात्कार की घटनाओं में इजाफा हो रहा था, अगर इस तरह का कोई कानून बन गया तो लड़कों के साथ बलात्कार की वारदातें बढ़ जाएंगी.....मां-बाप को अपनी बेटों ही नहीं बेटों की इज्जत के लिए फिक्रमंद होना पड़ेगा....क्योंकि जिस तरह से किसी लड़की के साथ सेक्स करने के बाद उसे आपसी सहमति से किया गया सिद्ध करना मुश्किल नहीं है.....उसी तरह किसी लड़के के साथ अप्राकृतिक सेक्स को भी आपसी सहमति से किया गया साबित कर दिया जाएगा......(क्रमशः)
ये शीला तूने क्या किया...
1 month ago

1 comments:
hm. cognitively text ))
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